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*शिवरात्रि के अनुष्ठान आपके मन की सजगता को कैसे बढ़ाते हैं?* *गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर*

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*शिवरात्रि के अनुष्ठान आपके मन की सजगता को कैसे बढ़ाते हैं?*
*गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर*

देसी चैनल कुल्लू 

सामान्यतः जब कोई उत्सव होता है तो सजगता खो जाती है; परंतु महाशिवरात्रि ऐसा उत्सव है, जिसमें विश्रांतिपूर्ण सजगता का अनुभव होता है। यह शरीर, मन और अहंकार के लिए गहन विश्राम का अवसर है, ऐसा विश्राम जो साधक को शिव-तत्त्व के परम ज्ञान के प्रति जागृत करता है।
शिवरात्रि के अनुष्ठान मन को एकाग्र करते हैं और पवित्रता तथा श्रद्धा का वातावरण रचते हैं। मनुष्य अनुष्ठानों के बिना नहीं रह सकता; चाहे वे धार्मिक हों, आध्यात्मिक हों या लौकिक, अनुष्ठान हर जगह विद्यमान हैं। ध्वजारोहण एक अनुष्ठान है, दीप प्रज्वलन एक अनुष्ठान है। यहाँ तक कि नास्तिक और साम्यवादी परंपराओं में भी अनुष्ठान होते हैं। यदि आप किसी लायंस या रोटरी क्लब में जाएँ, तो प्रारंभिक क्षणों में घंटी बजती है, सभा का आह्वान होता है, और संगठन की प्रतिज्ञा पढ़ी जाती है। सचेतन और अवचेतन दोनों स्तरों पर अनुष्ठान हमें एक निश्चित पथ, एक संकल्प और एक सूक्ष्म आयाम से जोड़ देते हैं, जिसे शब्दों में पूर्ण व्यक्त करना कठिन है।
उदाहरणार्थ, महाशिवरात्रि पर संपन्न होने वाला वैदिक अनुष्ठान ‘रुद्राभिषेकम्’ सहस्राब्दियों से समस्त जीव-जगत के कल्याण के लिए किया जाता रहा है। इसमें की जाने वाली प्रार्थनाएँ हैं, “वर्षा समय पर हो, फसल उत्तम हो, स्वास्थ्य, संपदा, ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति हो…” ये प्रार्थनाएँ ईश्वर से साधक के संबंध को सुदृढ़ करती हैं।
हमारे पूर्वज सूक्ष्म जगत से जुड़े इस गहन संबंध को समझते थे। वे जानते थे कि ब्रह्मांड और पिंड के मध्य एक अदृश्य सेतु विद्यमान है। जल पर मंत्रोच्चार करना, दीप प्रज्वलित करना, ये सभी कर्म वातावरण को सूक्ष्म और सकारात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए थे। अनुष्ठान केवल बाह्य क्रिया नहीं है; वह जीवन में उत्सव और आनंद का संचार करता है तथा मन को केंद्रित करता है।
जो साधक पूर्णतः स्थितप्रज्ञ और वैराग्ययुक्त है, उसे किसी अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं। किंतु जिसे अभी भी शांति, शक्ति, स्पष्टता या कृपा की आकांक्षा है, उसके लिए थोड़े-से अनुष्ठान की अनुशंसा की जाती है।
महाशिवरात्रि साधकों के लिए विशेष महत्त्व रखती है, क्योंकि इस रात्रि में जब नक्षत्र एक विशेष स्थिति में होते हैं, तब वातावरण ध्यान के लिए अत्यंत अनुकूल हो जाता है। इस रात्रि का ध्यान अत्यंत शुभ माना गया है, क्योंकि शिव-तत्त्व पृथ्वी पर विशेष रूप से प्रकट होता है। प्राचीन लोग कहा करते थे, “यदि प्रतिदिन ध्यान न कर सको, तो वर्ष में कम-से-कम एक दिन जागकर ध्यान करो।” इसका संदेश था, अपने भीतर स्थित दिव्यता को जागृत करो। वह दिव्यता बाहर कहीं नहीं, तुम्हारे भीतर ही है।
यह भी मान्यता है कि शिवरात्रि की रात्रि में सोना नहीं चाहिए। रात्रि-जागरण के माध्यम से व्यक्ति अनुभव करता है कि वह निद्रा पर भी विजय पा सकता है। किंतु यह जागरण शरीर को बाध्य करने का नाम नहीं है। जब शिव-तत्त्व का स्पर्श होता है, तब चेतना भीतर से स्वयं जागृत होती है। क्षीण और भटकी हुई सजगता पुनः उदित होने लगती है। यह आंतरिक जागरण ही वास्तविक ‘जागरण’ है। पूर्वकाल में लोग प्रकृति के अनुरूप जीवन जीते थे, अतः वे सहज ही रात्रि-जागरण कर लेते थे। आज यह प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता और स्वभाव के अनुसार होना चाहिए।
‘शिवरात्रि’ का शाब्दिक अर्थ है—‘शिव की रात्रि’। ‘रात्रि’ विश्राम का समय है, जब सब कुछ शांत और निस्तब्ध हो जाता है। शिवरात्रि केवल शरीर का ही नहीं, मन और अहंकार का भी विश्राम है। अपने भीतर शिव-तत्त्व का उत्सव मनाना ही वास्तविक शिवरात्रि है।
शिव कोई व्यक्तित्व मात्र नहीं, जो गले में सर्प धारण किए कहीं विराजमान हों। शिव वह निराकार तत्त्व है जो समस्त सृष्टि में व्याप्त है। वे गहन मौन और निःशब्दता का वह आकाश हैं, जहाँ मन की समस्त गतिविधियाँ विलीन हो जाती हैं। इस शिव-तत्त्व को जागकर अनुभव करना ही शिवरात्रि है। कहा गया है कि जब संसार सोता है, तब योगी जाग्रत रहता है। योगी के लिए प्रत्येक दिन शिवरात्रि है।
महाशिवरात्रि चेतना को सृष्टि की अनेकत्व से हटाकर उस एकत्व की ओर ले जाती है, जो सबके पीछे विद्यमान है।
शिवरात्रि दिव्य चेतना की शरण में जाना है, शिव-तत्त्व में विश्राम पाना है। १५ फरवरी २०२६ को आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित महाशिवरात्रि समारोह में सहभागी बनें और ध्यान तथा भक्ति के इस अलौकिक अनुभव का अंग बनें।

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