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नशा मुक्त भारत की दिशा में बड़ा कदम, कुल्लू पहुंचे 76 अधिकारी।

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नशा मुक्त भारत की दिशा में बड़ा कदम, कुल्लू पहुंचे 76 अधिकारी।

एक्सपोज़र विज़िट के दौरान पुनर्वास केन्द्र और काउंसलिंग प्रणाली का किया अध्ययन।

‘मिशन संभव’ बना नशा मुक्ति की उम्मीद, अधिकारियों ने समझी जमीनी हकीकत।

देसी चैनल कुल्लू 

बंजार (परस राम भारती):- हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में नशा मुक्ति क्षेत्र में चल रहे प्रयासों को समझने के लिए भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के 76 अधिकारियों ने एक विशेष अध्ययन दौरे (एक्सपोज़र विज़िट) में भाग लिया। यह कार्यक्रम शुक्रवार को कुल्लू में हिमालयन वालंटियर्स टूरिज्म फाउंडेशन द्वारा संचालित मिशन संभव, ‘वॉर अगेंस्ट ड्रग्स’ के तहत आयोजित किया गया। इस दौरे का आयोजन नई दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ सेक्रेटेरिएट ट्रेनिंग एंड मैनेजमेंट (ISTM) द्वारा किया गया था।

यह पहल भारत सरकार के नशा मुक्त भारत अभियान के उद्देश्यों के अनुरूप है, जिसका मुख्य लक्ष्य नशे की समस्या से निपटना, प्रभावी पुनर्वास व्यवस्था को समझना और समाज की भागीदारी से समाधान को मजबूत करना है।

इस दौरान भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से आए अधिकारियों ने कुल्लू और भुंतर स्थित परिवर्तन पुनर्वास केंद्र और संकल्प पुनर्वास केंद्र का निरीक्षण किया। इन केंद्रों का संचालन मिशन संभव से जुड़े कार्यकर्ता विशाल और रोहन द्वारा किया जा रहा है। अधिकारियों ने यहां नशा मुक्ति की पूरी प्रक्रिया, काउंसलिंग व्यवस्था और नशे से उबर चुके युवाओं के जीवन अनुभवों के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की।

पुनर्वास केंद्रों में इलाज करा रहे युवाओं ने जब अपनी संघर्षपूर्ण कहानियां साझा कीं, तो अधिकारियों पर इसका गहरा भावनात्मक प्रभाव पड़ा। इन अनुभवों से यह स्पष्ट हुआ कि नशे की लत एक गंभीर लेकिन पूरी तरह उपचार योग्य समस्या है, यदि परिवार, समाज और सरकार मिलकर सहयोग करें।

क्या है प्रोजेक्ट
मिशन संभव।

इस मुहिम के संस्थापक पंकी सूद का कहना है कि
नशे से मुक्ति की राह पर एक नई उम्मीद लेकर ‘मिशन संभव’ नशे के ख़िलाफ़ जंग एक सामाजिक पहल है, जो नशे के शिकार लोगों तक जागरूकता, सहानुभूति और इलाज पहुँचाने का काम कर रही है।
इनका मानना है कि नशा कोई अपराध नहीं, बल्कि इलाज योग्य बीमारी है।
मिशन संभव के ज़रिए युवाओं को नशे से बाहर निकालने के प्रयास किए जाते है। इनका कहना है कि आज के समय में नशे के खिलाफ सामूहिक प्रयास बेहद जरूरी हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो देश एक पूरी पीढ़ी को नशे की चपेट में खो सकता है। उन्होंने समाज से अपील की कि नशे से जूझ रहे लोगों के प्रति संवेदनशील और सहयोगात्मक रवैया अपनाया जाए, क्योंकि सामाजिक स्वीकार्यता ही पुनर्वास की सबसे बड़ी ताकत होती है।

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि स्कूल स्तर पर, खासकर आठवीं कक्षा से ही, नशा जागरूकता को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए ताकि बच्चों को शुरू से ही सही दिशा मिल सके। साथ ही, उन्होंने पुनर्वास क्षेत्र में काम कर रहे अनुभवी लोगों, जैसे अरविंद वाधवान, को नीति निर्माण और सलाहकार समितियों में शामिल करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

इस कार्यक्रम के कोर्स समन्वयक रोशन, के.आर. मिश्रा और सुश्री रिज़वान बानो ने बताया कि नशा मुक्ति आज एक राष्ट्रीय चुनौती बन चुकी है। इस अध्ययन दौरे से प्राप्त सुझावों और अनुभवों को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, ताकि भविष्य की नीतियों में इनका उपयोग किया जा सके।

मिशन संभव के माध्यम से हिमालयन वालंटियर्स टूरिज्म फाउंडेशन लगातार सरकार, पुनर्वास संस्थानों और समाज के बीच समन्वय स्थापित कर रहा है और नशामुक्त भारत के लक्ष्य की दिशा में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है।

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